Mangitungi Chalisa | मांगीतुंगी चालीसा
Jain Chalisa - Shri Mangitungi Chalisa (मांगी तुंगी चालीसा) full lyrics in Hindi. Jain Mangitungi Siddhakshetra chalisa lyrics in Hindi for Jain people.
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Shri Mangitungi Chalisa (मांगीतुंगी चालीसा) full in Hindi is as given below -
(श्री मांगीतुंगी चालीसा प्रारंभ)
दोहा -
सिद्ध प्रभु श्रीराम को , नमन करुं शत बार।
कोटि निन्यानवे साधु को , वंदन बारम्बार।।१।।
प्राप्त किया शिवधाम को, तुंगीगिरि पर जाय।
बने सिद्ध परमात्मा, आत्मधाम को पाय।।२।।
मांगीतुंगी तीर्थ का , चालीसा सुखकार।
पढ़ें पढ़ावें भव्यजन, पावें सौख्य अपार।।३।।
चौपाई -
जय श्रीराम जगत के स्वामी, वीतराग शुद्धातम ज्ञानी।
जिन मुनि बनकर कर्म खपाया, तुंगीगिरि से शिवपद पाया।।४।।
तीर्थ अयोध्या में जन्मे थे, पुण्य किया बलभद्र बने थे।
दशरथ के प्रिय पुत्र कहाए, भरत लखन से भाई पाए।।५।।
सीता के संग ब्याह रचाया, राजसुखों की थी ही छाया।
राजा बनने के दिन आए, तब संकट के बादल छाए।।६।।
तात वचन की खातिर, विचरे वे बन बन में जाकर।
सीता अरु लक्ष्मण थे संग, दु:ख भी दु:ख था बन उपवन में।।७।।
कई परीक्षा के क्षण आए, रामायण से सुना कथाएं।
सीता सती ने दीक्षा ली, हुए काल कवलित लक्ष्मण भी।।८।।
राम के मन वैराग्य समाया, दीक्षा ले सार्थक की काया।
उत्तर से दक्षिण में जाकर, तुंगीगिरि पर ध्यान लगाकर।।९।।
अष्टकर्म को नष्ट कर दिया, शिवलक्ष्मी का वरण लिया।
हनुमंतादि महामुनि ने भी तपकर मूक्तिकन्या बरली।।१०।।
तब से यह मांगीतुंगी गिरि, कहलाता है सिद्धक्षेत्र गिरि।
इतिहासों में इसका वर्णन, पढ़ने में आता है स्र्विणम।।११।।
कृष्णप्रभात बलदेव भी मुनि बन, तप करने आए यहाँ गिरि पर।
उनकी मूरत पाषाणों में, बनी आज भी वहाँ शैल खण्डहर में।।१२।।
सीताजी के चरण बने हैं, वे उनके तप चिन्ह बने हैं।
हुई समाधि पद पाया, सफल हो गई नारी काया।।१३।।
तीरथ यद्यपि पौराणिक था, दक्षिण भारत में प्रसिद्ध था।
श्री आचार्य शांतिसागर जी ने, आ पर्वत वन्दना करी थी।।१४।।
संवत उन्नीस सौ तिरानवे में, पंचकल्याणक सन्निधी में।
पुन: उन्हीं की परम्परा के, पंचम पट्टाचार्य मुनि थे।।१५।।
श्री श्रेयांस सिंधु गुरु जानो, उनकी प्रबल प्रेरणा मानो।
तीर्थोद्वार हुआ वर्षों तक, बनी र्मूित्याँ चौबीसों प्रभु की।।१६।।
मुनिसुव्रत की ऊँची प्रतिमा, सहस्रकूट जिनवर की महिमा।
भारत भर में फैली कीरत, मांगीतुंगी है एक तीरथ।।१७।।
मानस्तंभ बना है नीचे, कितने ही अतिशय यहाँ दिखे।
पाश्र्वनाथ पद्मासन प्रतिमा, इन सब से तीरथ की गरिमा।।१८।।
देवइन्द्र भी दर्शन करते, मनुज वंदना कर निंह थकते।
कई साधु—साध्वी आते हैं, दर्शन कर मन हर्षाते हैं।।१९।।
जिनवर की निर्वाण भूमि यह, मुनि की कर्म भूमि यह।
न्यायी वहाँ विजय होता है, मान यहाँ खंडित होता है।।२०।।
सोरठा -
चालीस दिन तक जो पढ़े, यह चालीसा पाठ।
निजगुण में उत्तुंग वे, करे जगत में ठाठ।।१।।
विक्रम संवत दो सहस, त्रेपन सुदि वैशाख।
पंचम तिथि में रच गया, चालीसा विख्यात।।२।।
ज्ञानमति गणिनी प्रमुख, की शिष्या अज्ञान।
रचा ‘‘चंदनामती’’ सुखद, सिद्धक्षेत्र गुणगान।।३।।
लेखक - ब्र. पं. गणेशलाल नाथूलाल जी जैन, मांगीतुंगी
(समाप्त)
दोहा -
सिद्ध प्रभु श्रीराम को , नमन करुं शत बार।
कोटि निन्यानवे साधु को , वंदन बारम्बार।।१।।
प्राप्त किया शिवधाम को, तुंगीगिरि पर जाय।
बने सिद्ध परमात्मा, आत्मधाम को पाय।।२।।
मांगीतुंगी तीर्थ का , चालीसा सुखकार।
पढ़ें पढ़ावें भव्यजन, पावें सौख्य अपार।।३।।
चौपाई -
जय श्रीराम जगत के स्वामी, वीतराग शुद्धातम ज्ञानी।
जिन मुनि बनकर कर्म खपाया, तुंगीगिरि से शिवपद पाया।।४।।
तीर्थ अयोध्या में जन्मे थे, पुण्य किया बलभद्र बने थे।
दशरथ के प्रिय पुत्र कहाए, भरत लखन से भाई पाए।।५।।
सीता के संग ब्याह रचाया, राजसुखों की थी ही छाया।
राजा बनने के दिन आए, तब संकट के बादल छाए।।६।।
तात वचन की खातिर, विचरे वे बन बन में जाकर।
सीता अरु लक्ष्मण थे संग, दु:ख भी दु:ख था बन उपवन में।।७।।
कई परीक्षा के क्षण आए, रामायण से सुना कथाएं।
सीता सती ने दीक्षा ली, हुए काल कवलित लक्ष्मण भी।।८।।
राम के मन वैराग्य समाया, दीक्षा ले सार्थक की काया।
उत्तर से दक्षिण में जाकर, तुंगीगिरि पर ध्यान लगाकर।।९।।
अष्टकर्म को नष्ट कर दिया, शिवलक्ष्मी का वरण लिया।
हनुमंतादि महामुनि ने भी तपकर मूक्तिकन्या बरली।।१०।।
तब से यह मांगीतुंगी गिरि, कहलाता है सिद्धक्षेत्र गिरि।
इतिहासों में इसका वर्णन, पढ़ने में आता है स्र्विणम।।११।।
कृष्णप्रभात बलदेव भी मुनि बन, तप करने आए यहाँ गिरि पर।
उनकी मूरत पाषाणों में, बनी आज भी वहाँ शैल खण्डहर में।।१२।।
सीताजी के चरण बने हैं, वे उनके तप चिन्ह बने हैं।
हुई समाधि पद पाया, सफल हो गई नारी काया।।१३।।
तीरथ यद्यपि पौराणिक था, दक्षिण भारत में प्रसिद्ध था।
श्री आचार्य शांतिसागर जी ने, आ पर्वत वन्दना करी थी।।१४।।
संवत उन्नीस सौ तिरानवे में, पंचकल्याणक सन्निधी में।
पुन: उन्हीं की परम्परा के, पंचम पट्टाचार्य मुनि थे।।१५।।
श्री श्रेयांस सिंधु गुरु जानो, उनकी प्रबल प्रेरणा मानो।
तीर्थोद्वार हुआ वर्षों तक, बनी र्मूित्याँ चौबीसों प्रभु की।।१६।।
मुनिसुव्रत की ऊँची प्रतिमा, सहस्रकूट जिनवर की महिमा।
भारत भर में फैली कीरत, मांगीतुंगी है एक तीरथ।।१७।।
मानस्तंभ बना है नीचे, कितने ही अतिशय यहाँ दिखे।
पाश्र्वनाथ पद्मासन प्रतिमा, इन सब से तीरथ की गरिमा।।१८।।
देवइन्द्र भी दर्शन करते, मनुज वंदना कर निंह थकते।
कई साधु—साध्वी आते हैं, दर्शन कर मन हर्षाते हैं।।१९।।
जिनवर की निर्वाण भूमि यह, मुनि की कर्म भूमि यह।
न्यायी वहाँ विजय होता है, मान यहाँ खंडित होता है।।२०।।
सोरठा -
चालीस दिन तक जो पढ़े, यह चालीसा पाठ।
निजगुण में उत्तुंग वे, करे जगत में ठाठ।।१।।
विक्रम संवत दो सहस, त्रेपन सुदि वैशाख।
पंचम तिथि में रच गया, चालीसा विख्यात।।२।।
ज्ञानमति गणिनी प्रमुख, की शिष्या अज्ञान।
रचा ‘‘चंदनामती’’ सुखद, सिद्धक्षेत्र गुणगान।।३।।
लेखक - ब्र. पं. गणेशलाल नाथूलाल जी जैन, मांगीतुंगी
(समाप्त)
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